राजनीति मंदिर है। मंदिर में मूर्तियां जरूरी हैं। मूर्तियां रहती हैं तो आस्था और विश्वास बना रहता है। मूर्तियां व्यक्ति के न होने के बावजूद उसके अहसास और प्रेरणा को जिंदा रखती हैं। भारतीय राजनीति में मूर्तियों का होना अहम है। उस नेता का कोई मोल नहीं जो मूर्तियों से प्रेम नहीं करता या उन्हें स्थापित नहीं करवाता। मूर्ति चाहे अपनी हो या किसी महान व्यक्ति की बस 'मूर्ति' होनी चाहिए।
मैं इस बात से बेहद आहत हूं कि मायावती के मूर्ति-प्रेम पर इधर-उधर से आपत्तियां उठाई जा रही हैं। उन पर रोक लगाने का विचार चला रहा है। क्या हुआ जो उन्होंने कुछ मूर्तियां अपनी या बाबा साहेब की स्थापित करवा लीं। आखिर उनका कद बाबा साहेब से कम थोड़े ही है! बाबा साहेब भी दलितों के मसीहा थे और मायावती भी हैं! बेशक वे दलित राजनीति में बाबा साहेब के इर्द-गिर्द कहीं खड़ी नहीं होतीं, लेकिन उनकी मूर्तियों के संग-साथ तो हो ही सकती हैं। राजनीति में बस कद बड़ा होना चाहिए। मूर्तियों की लंबाई स्वयं ही तय हो जाती है।
मूर्तियों से केवल राजनीति में ही नहीं समाज और आम आदमी के बीच भी नेता का कद बड़ा बना रहता है। मूर्तियां नेताओं को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। भारतीय राजनीति का रंग-ढंग ही कुछ ऐसा रहा है कि यहां जब तक नेताओं की मूर्तियां न लगें उनका मान नहीं बढ़ता। नेता के लिए समाज और जन से कहीं ज्यादा जरूरी है, मूर्तियों का रख-रखाव और उन पर खर्च।
अब जो मायावती के मूर्ति-खर्च पर आंख-भौं सिकोड़ रहे हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि वे राज्य की मुखिया हैं। और मुखिया किसी जन की मर्जी का मालिक नहीं होता। वो खुद अपना मालिक होता है। दरअसल, लोकतंत्र में रहने का यही फायदा है कि यहां सिर्फ 'मेरी मर्जी' चलती है। अब मर्जी के आगे तो हर रोक-टोक और आपत्ति बेकार है न!
मेरी समझ से मायावती ने अपनी मुर्तियां स्थापित कर कुछ भी फिजूलखर्जी नहीं की है। जनता का पैसा मूर्तियों की शक्ल में खड़ा हुआ है। प्रदेश या जन को विकास से कहीं अधिक मूर्तियों की जरूरत है। मूर्तियों का होना व्यक्ति के प्रति आकर्षण को जिंदा रखता है। मायावती ने यही तो किया है। यह तो भारतीय राजनीति का नियम है कि यहां मूर्तियों की स्थापना में ही देश प्रदेश और जन का विकास छिपा होता है।
जिस देश-प्रदेश में नेताओं की मूर्तियां नहीं वो जगह ही बेकार है।
अब कोई कुछ कहे पर मुझे अपने उत्तर प्रदेश पर गर्व है क्योंकि यहां मूर्तियों में मुख्यमंत्री बसती हैं। विस्तार लेती मूर्तियों की संख्या बताती है कि यहां विकास और जन का क्या हाल है। क्योंकि समझदार को केवल इशारा ही काफी होता है।
गुरुवार, ९ जुलाई २००९
राजनीति में मूर्तियां जरूरी हैं
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

3 टिप्पणियाँ:
पत्थर के लोग हैं
पत्थर की मूर्तियां
बस नहीं है तो कहीं
इक आदमी अदद
आखिर पक्षियों को बीट करने के लिए कुछ तो चाहिए।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
साहित्य में भी
एक टिप्पणी भेजें